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कॉमनवेल्थ vs आइ.पी.एल

कॉमनवेल्थ गेम्ज़ अर्थात राष्ट्र मंडल खेल अभी बस पाँच दिन पहले बड़े ही शानदार तरीक़े से प्रारम्भ हुए है।

आग़ाज़ के साथ ही हमारे खिलाड़ी लगातार बेहतरीन, प्रशंसा के योग्य अपना प्रदर्शन दिखा रहें है। हमारे ये होनहार लगातार देश के लिए मेडल जीत रहें है।

साधुवाद! शाबाश ! बहुत ख़ूब!

मीडिया, न्यूज़ चैनल भी थोड़ी बहुत कवरेज दिखा रहें है। अख़बार के पन्नो पर जगह मिल रही है, खिलाड़ियों के प्रदर्शन की सराहना भी हो रही है।

दूसरी ओर भारत में क्रिकेट का महाकुम्भ चल रहा है। वही आइ.पी.एल। पैसों और क्रिकेट के सितारों की चकाचौंध के साथ भव्य आग़ाज़! 

करोड़ों में ख़रीदे गये खिलाड़ी और कई करोड़ की टीम, युवा दर्शक वर्ग, विज्ञापनो का अंबार, ढेरों चैनल जो किसी भी क़ीमत पर प्रसारण के अधिकार ख़रीदते हैं। चीयर गर्ल्स और दर्शकों से खचाखच भरा स्टेडीयम, पैसों की बेशुमार बारिश और नाम भी।

अब कुछ सोचने वाली गम्भीर बात यह है कि हमारे देश की शान और नाम बढ़ाने वाले कॉमनवेल्थ गेम्ज़ के खिलाड़ियों को क्या मिलता है?

कॉमनवेल्थ के ये सभी खिलाड़ी अपने दम पर, अपने ख़र्च पर सालों साल कड़ी मेहनत कर, पसीना बहा कर ख़ुद को साबित करते है। तब इन्हें खेलने का मौक़ा मिलता है। और अगर ये कोई पदक ले आते है तो ठीक है नही तो इनकी हँसी उड़ाई जाती है, उपहास का पात्र बनाया जाता है।

वहीं आइ.पी.एल वालों को मोटी धन राशि देकर खेलने के लिए ख़रीदा जाता है, हर काम के पैसे मिलते है। चौका छक्का लगाने के, कैच लेने के, विकेट लेने के, और भी बहुत कुछ।

आज सबको नाम और पैसा चाहिए जो हमारे देश में आइ.पी.एल जैसे आयोजनों से ही मिल सकता है। तो फिर कोई हमारे देसी खेलो में, कामन्वेल्थ में क्यूँ अपना समय लगाएगा? कैसे इन खेलों को बढ़ावा मिल सकता है?

वर्तमान योजनाओं से तो ऐसी कोई आशा नही है कि युवा वर्ग क्रिकेट की चकाचौंध को छोड़ अपना पसीना कुश्ती या मुक्केबाज़ी के लिए बहायेंगे।

क्या कोई बड़ी कम्पनी इन खिलाड़ियों की आर्थिक सहायता के लिये हाथ बढ़ायेगी?

अभी तो दूर दूर तक कोई आशा नही है, भविष्य में शायद कुछ चमत्कार हो जाए…

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